Tuesday, March 22, 2011

परदेश....






दौडती-भागती गाडियॉ बिखरा हुआ इंसान है
बडे शहरों  में  शायद  वक्त  ही  भगवान  है


चार लोग  जानते  तो  थे  अपने  शहर में
यहॉ  बस  खुदगर्जो  में  झूठी  शान  है


अजनबी  बन के मिलते हैं अपने अपनों से
जैसे  हर  कोई  एक  दूसरे  से  अंजान  है


असीरों  को उडनें के झूठे  ख्वाब  दिखा  कर 
यहॉ ज़िदगी दूर से लगती कितनी आसान है


लौट  आओ  कुछ  नहीं  रखा  परदेश  में
बूढी   ऑखो  में  बची  थोडी  ही  जान है


जानें किसकी तलाश में  चले आए यहॉ
'शेष'  तुम्हारे  घर  में  तो  हर सामान है